Dies Irae : डर हमेशा सबसे गहरा तब लगता है जब वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घुल-मिल जाए। जब हवा का एक झोंका, एक रोशनी की किरण या बालों की क्लिप की क्लिक की आवाज़ भी रोंगटे खड़े कर दे, तब समझिए कि डर ने अपनी जड़ें दिल में जमा ली हैं। यही एहसास ‘Dies Irae’ में मिलता है, जिसे डायरेक्टर राहुल सादासिवन ने इतनी बारीकी से गढ़ा है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी उसका असर लंबे समय तक बना रहता है।
कहानी जो डर को महसूस कराती है, दिखाती नहीं

Dies Irae फिल्म का मुख्य किरदार रोहन (प्रणव मोहनलाल) एक बेहद अमीर परिवार का बेटा है, जो अपने विशाल घर में कुछ अजीब महसूस करता है। उसे लगता है कि इस आलीशान दीवारों के पीछे कुछ तो गड़बड़ है। यह एहसास धीरे-धीरे एक गहरे डर में बदल जाता है, जो न सिर्फ उसके घर बल्कि उसकी आत्मा को भी जकड़ लेता है। डर से बाहर निकलने के लिए रोहन अतीत की परतें उधेड़ता है और यहीं से फिल्म अपनी रहस्यमयी और रोमांचक दिशा पकड़ती है।
Bhoothakalam’ से अलग लेकिन उतनी ही डरावनी
राहुल सादासिवन की पिछली फिल्म ‘Bhoothakalam’ अपने अनदेखे डर के लिए जानी जाती थी, लेकिन ‘Dies Irae’ इससे बिल्कुल अलग है। यहां डर दिखाई देता है, महसूस होता है और कभी-कभी सीधा आंखों के सामने आ जाता है। इसके बावजूद यह ओवरड्रामैटिक नहीं लगता। साउंड, एडिटिंग, कैमरा एंगल और म्यूजिक की जबरदस्त संगति फिल्म को एक सिनेमैटिक नाइटमेयर बना देती है, जो थिएटर में देखने लायक अनुभव देती है।
सिनेमैटोग्राफी जो हर सीन को कला बना देती है
Dies Irae फिल्म के सिनेमैटोग्राफर शेहनाद जलाल ने रोशनी और अंधेरे का ऐसा संतुलन दिखाया है, जो डर को और गहराई देता है। फिल्म के कई सीक्वेंस ऐसे हैं, जहां कैमरा मूवमेंट और शैडो प्ले इतना प्रभावशाली है कि दर्शक खुद को रोहन की जगह महसूस करने लगते हैं। इंटरवल से ठीक पहले का सीक्वेंस इस बात का सबसे सुंदर उदाहरण है धीरे-धीरे बढ़ता तनाव, फिर एकदम से बढ़ी गति और फिर सन्नाटा… जो केवल डर नहीं, बल्कि कला की पराकाष्ठा है।
थ्रिलर और इमोशन का दिलचस्प संगम
Dies Irae फिल्म का शुरुआती हिस्सा आपको एक सामान्य हॉरर कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन दूसरा हाफ इसे एक मिस्ट्री थ्रिलर में बदल देता है। जब कहानी अपने रहस्यमय मोड़ पर पहुंचती है, तो वहां एक भावनात्मक क्षण उभरता है जो कहानी में गहराई जोड़ देता है। निर्देशक राहुल सादासिवन ने स्क्रीनप्ले में डर और इमोशन दोनों का ऐसा संतुलन रखा है कि दर्शक न सिर्फ डरते हैं, बल्कि किरदार से जुड़ भी जाते हैं।
अभिनय जो डर को असली बनाता है

प्रणव मोहनलाल ने रोहन के रूप में बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। उनका चेहरा, उनकी आंखें और उनका डर – सब कुछ वास्तविक लगता है। उनके साथ गिबिन गोपीनाथ, अरुण अजिकुमार और जया कुरुप जैसे कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं में पूरी ईमानदारी दिखाई है। हर किरदार अपने हिस्से का डर लेकर आता है, और यही डर दर्शकों तक बिना किसी बनावट के पहुंचता है।
मलयालम सिनेमा का नया हॉरर क्लासिक
‘Dies Irae’ सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यह दिखाती है कि डर केवल भूतों से नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे असुरक्षा और रहस्यों से भी पैदा होता है। राहुल सादासिवन ने इस फिल्म के जरिए फिर साबित किया है कि वे भारतीय हॉरर सिनेमा के सबसे बेहतरीन फिल्ममेकर्स में से एक हैं।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी और राय केवल समीक्षा के उद्देश्य से हैं। फिल्म देखने का अनुभव व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है।
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